ईमाम महदी का ज़हूर, सैयदना ईसा अलैहिस्सलाम और दज्‍जाल का फितना।

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  1. हज़रत आदम से लेकर आज तक इन्‍सानियत ने अपनी तारीख में कई परेशानियां और संकट देखें है । आज के दौर की नसल शदीद किस्‍म का भ्रष्‍टाचार (बदउनवानी) और ज़ुल्‍म देख रही है जो पूरी दुनिया पर हावी हो गये हैं। पूंजीवादी (सरमायादाराना) व्‍यवस्‍था ने दुनिया को ताक़तवर और मालदार लोगों के लिये आम जनता का जान माल और दौलत को लूटने-खसूटने के खेल का मैदान बना दिया है। इन हालात के नतीजे में कई लोग अपने आपको इन से पूरी तरह घिरा हुआ पाते है और वोह महसूस करते है कि वोह खुद इन हालात को बदलने में नाकामयाब है। यहूदी और नसरानी सबसे पहले थे जो मुश्किलात का सामना पडने पर, उनको काबू करने का हौंसला जुटाने की जगह, दुनिया के अंत और खात्मे की बात करने लगे

और दूसरी बार ज़ाहिर होने (ईसा अलैहिस्‍सलाम) की। उनके मुताबिक सिर्फ इसा (अलैहिस्सलाम) के दूसरी बार ज़ाहिर होने के बाद ही दुनिया फिर से बहतर और इंसाफ पर मबनी बन पाऐगी। उन्‍होंने अपनी असक्रियता और किस्‍मत के भरोसे बैठे रहने की यह तावील दी कि इन परेशानियों से छुटकारा हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के दोबारा ज़ाहिर होने से होगा। यानी की हम हालात को बदलने के लिये कुछ नही कर सकते, इसलिये हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के दोबारा ज़ाहिर होने का इंतजार किया जाऐ और दुनिया को अपने हाल पर छोड़ दिया जाऐ।

आज मुसलमान भी चारो तरफ से बेशुमार परेशानियों और चेलेन्‍जेस का सामना कर रहे है और अफसोस की बात यह है कि उनमें से कई इसी मानसिकता का शिकार हो गये है। कुछ मुसलमान भी इस फंदे में फस गये और इस्‍लामी नस (क़ुरआन और सुन्नत) की इस अन्‍दाज ने तश्‍रीह करने लगे जो निष्क्रियता और किस्मत के भरोसे बैठे रहने की तरफ ले जाता है। इस तश्‍रीह का असर यह पडा़ की लोग परेशानियों की वजह को हटाने की कोशिश नहीं करते जिसके कारण उम्‍मत की हालत बद से बदतर होती जा रही है। बल्कि वोह अपना ज़्यादातर वक्‍त अपनी सुस्ती और निष्क्रियता को सहीह साबित करने के लिये दज्‍जाल के ज़हूर की निशानियां, इमाम महदी का इंतज़ार और हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की वापसी जिसके ज़रिऐ उम्‍मत का इस पश्‍चिमी ज़ालिमाना निज़ाम और ज़ुल्‍म से निजात पाने पर भरोसा करके बैठें है।

हमारे लिये यह समझना बहुत ज़रूरी है कि शरई दलील (नस) को समझने के लिये हमारे पास कौन सी ज़हनियत हो और किस तरह यह दलील हमारे बर्ताव, अमल और फिक्र को दिशा (सिम्‍त) दे। यह बात साफ ज़ाहिर है कि कज़ा (Fatalism) के अकीदे पर आधारित मानसिकता मुसलमान ज़िन्‍दगी के कई पहलुओं से जोड कर देखते है, लेकिन उसे सब मसलों (पहलुओं) से नही जोडते। हम देखते है की कई लोग जो सियासी हालात मे तब्दीली को किस्‍मत (कज़ा) के नज़रिये या मानसिकता से देखते है, लेकिन जब रिज्‍़क (रोज़ी-रोटी) की बात आती है, जिसे अल्‍लाह मुहय्या करता है तो इस मामले में कज़ा पर भरोसा नहीं करते यानी रिज्‍़क हासिल करने के लिये हर तरह की कोशिश और जद्दोजहद करते है,

यहॉ तक की अपने घर परिवार को और अपने प्‍यारों को छोडकर परदेश तक जाने के लिये तैयार रहते है ताकि उन्‍हे कोई काम-धन्‍धा मिल जाऐ। हांलाकि शरीअत की नस में यह बात क़तई तौर पर (जिसकी दलील और मफहूम दोनो क़तई हैं) साबित है कि रिज्‍़क अल्‍लाह की तरफ से होता है।
यह बात भी बिल्‍कुल साफ है कि वोह मुस्लिम जो कज़ा मानसिकता रखते है, अगर किसी तरह उनकी जान पर बन आऐ तो वोह उसे बचाने के लिये हर तरह की कोशिश करेंगे। वोह उस बस के सामने नही ठहरेंगे जब वोह उनकी तरफ आ रही होगी। जब उन पर बिमारी आ जाती है,

तो वोह डॉक्‍टर से ईलाज कराते है और अगर वोह डाक्टर मदद नही कर सके तो वोह बहतर ईलाज कराने की कोशिश करतें है। वोह अपनी जान बचाने के लिये खतरनाक जगहों पर जाने से बचेगें और जिन्‍हे वोह चाहते है उन्‍हे भी बचाने की कोशिश करेगें। ऐसा इसके बावजूद भी करेगे जबकि अल्‍लाह (स.) ने क़तई तौर पर (क़तई सुबूत और क़तई दलील) बयान किया है कि मौत अल्‍लाह की तरफ से आती है और ज़िन्‍दगी के वक्‍त का खात्‍म उसी की तरफ से है।

जब हम नस (कुरआन और सुन्‍नत) में देखते है तो पाते है कि इनमे से कुछ र्इमान से ताल्‍लुक रखते है। चूंकि इस दलील का ताल्‍लुक ईमान से होता है इसलिए इस नस को क़तई दलील और सुबूत के ऐतबार से होना ज़रूरी है। कुरआन में ऐसी कई आयात है जो ईमान से जुडे़ तत्वों को निर्धारित करती है जैसे :
“ऐ इमान वालों! अल्लाह तआला पर, उसके रसूल सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम पर और उस किताब पर जो उसने अपने रसूल पर उतारी है और उन किताबों पर जो इस से पहले उस ने नाज़िल फरमाई है, इमान लाओ! जो शख्स अल्लाह तआला से, और उसके फरिश्तों से और उसकी किताबों से, और उसके रसूलों से और क़यामत के दिन से कुफ्र करे, वोह तो बहुत बढी दूर की गुमराही मे जा पडा.” (तर्जुमा मआनीऐ कुरआन सूर निसा

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