जब अबू जहल ने पैगम्बर मुहम्मद की शान में गुस्ताखी की तो दुसरे चाचा अबू हमजा ने क्या किया-

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एलान-ए-नुबूवत के छटे साल हज़रत अमीर हमज़ा और हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़िअल्लाह अन्हु 2 ऐसी हस्तियां दामन-ए-इस्लाम में आ गई जिनसे इस्लाम और मुसलमानों के जाहो जलाल और इनके इज़्ज़तो इक़बाल का परचम बहुत सरबूलंद हो गया, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के चाचाओं में हज़रत अमीर हमज़ा को मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से वालीहाना मुहब्बत थी और, वो सिर्फ 2 या 3 साल हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से उम्र में बड़े थे, चूँकि इन्होंने भी हज़रत सुवैबा का दूध पिया था, इसलिए हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के रज़ाई भाई भी थे।

हज़रत अमीर हमज़ा रज़िअल्लाह अन्हु बहुत ही ताक़तवर और बहादुर इंसान थे, और शिकार के बहुत ही शौक़ीन थे, रोज़ाना सुबह सवेरे तीर कमान लेकर, घर से निकल जाते और, शाम को शिकार से वापिस लौटकर हरम में जाते, खान-ए-काबा का तवाफ़ करते और क़ुरैश के सरदारों की मजलिस में कुछ देर बैठा करते।

एक दिन हस्ब-ए-मामूल शिकार से वापस लौटे तो इब्न-ए-जुदआन की लौंडी और खुद इनकी बहन हज़रत बीबी सफ़िया रज़िअल्लाह अन्हा, ने इनको बताया कि, आज अबु जेहल ने किस किस तरह तुम्हारे भतीजे मुहम्मद के साथ बेअदबी और गुस्ताख़ी की है, ये माजरा सुनकर मारे ग़ुस्से के हज़रत अमीर हमज़ा रज़िअल्लाह अन्हु का खून ख़ौलने लगा, एकदम तीर कमान लिए हुए, मस्जिद-ए-हराम में पहुंच गए और अपनी कमान से अबु जेहल के सिर पर, इतनी जोर से मारा की सिर फट गया, और कहा कि तू मेरे भतीजे मुहम्मद को गालियां देता है?

तुझे ख़बर नहीं की मैं भी उसीके दीन पर हूँ, ये देखकर क़बील-ए-बनी मख्ज़ूम के कुछ लोग अबु जेहल की मदद के लिए खड़े हो गए तो, अबु जेहल ने ये सोचकर की कहीं बनू हाशिम से जंग ना छिड़ जाए, ये कहा कि ऐ बनी मख्ज़ूम आप लोग हमज़ा को छोड़ दीजिए, वाक़ई आज मैंने इनके भतीजे, को बहुत ही खराब खराब किस्म की गालियां दी थी।

हज़रत अमीर हमज़ा ने इस्लाम कुबूल करने के बाद, ज़ोर ज़ोर से इन अशआर को पढ़ना शुरू कर दिया था।“मैं अल्लाह तआला की हम्द करता हूँ, जिस वक़्त की उसने मेरे दिल को इस्लाम और दीन-ए-मुहम्मदी की तरफ़ हिदायत दी”“जब एहकाम-ए-इस्लाम की हमारे सामने तिलावत की जाती है तो बा कमाल अक़्ल वालों के आंसू जारी हो जाते हैं।

तुम उनसे कह दो, कि ये वो घर में क़ुरआन पढ़ें वरना, तुम अपनी पनाह की ज़िम्मेदारी से दस्त बरदार हो जाओ, चुनांचे इब्न-ए-दुग़ाना ने हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ रज़िअल्लाह अन्हु से कहा कि ऐ अबु बकर आप घर के अंदर छुपकर क़ुरआन पढ़ें वरना कुफ़्फ़ार-ए-मक्का आपको सतायेंगे तो मै इसका ज़िम्मेदार नहीं होऊंगा, ये सुनकर हज़रत अबु बकर सिद्दीक़ रज़िअल्लाह अन्हु ने फ़रमाया की तुम अपनी पनाह की ज़िम्मेदारी से अलग हो जाओ मुझे मेरे अल्लाह की पनाह काफ़ी है, और उसकी मर्ज़ी पर राज़ी ब रिज़ा हूँ।

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