“औरंगजेब ने मंदिरों को गिराया नही बल्कि बचाया था”- अमेरिकी इतिहासकार का दावा

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हैदराबाद पुलिस ने अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुस्के का 11 अगस्त को आयोजित ‘अलोकप्रिय कहानियां: भारत इस्लामी अतीत को नकारना और वर्तमान-दिवस पूर्वाग्रहों को नेविगेट करना’ कार्यक्रम को अनुमति देने से इंकार कर दिया है। ट्रुस्के ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। वह इंडोलॉजी में पीएचडी है, लगभग दो दशकों तक संस्कृत का अध्ययन कर रही है। और इतिहास के बड़े जानकारों में गिनी जाती हैं.

उन्होंने तीन विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाया है। उनका कहना है कि आरएसएस और भाजपा से जुड़े लोगों ने हैदराबाद पुलिस के पास मेरी उपस्थिति का विरोध किया था।यह कार्यक्रम कृष्णाकृति फाउंडेशन और हिस्ट्री फॉर पीस के सहयोग से आयोजित था। वहीं उन्होंने कहा की हिन्दू संगठन हमेशा कहता है की अयोध्या में राम मंदिर बाबर के शासनकाल के दौरान नहीं, बल्कि औरंगजेब के शासनकाल में तोड़ा गया था। … उनका कहना है कि बाबर किसी भी परिस्थिति में अयोध्या नहीं आया या वहां राम जन्मभूमि मंदिर को गिराने का आदेश नहीं दिया।

ट्रुस्के ने अफसोसपूर्वक कहा कि वह भारत यात्रा के लिए हैदराबाद नहीं जा रही हैं। उनको मुगल इतिहास और संस्कृत साहित्य पर हैदराबाद में बात रखनी थीं। वह विशेष रूप से 1680 के दशक में देक्कन में औरंगजेब के क्रूर हमलों के बारे में और दूसरी सहस्राब्दी में भारतीय बौद्ध धर्म के अंत के बारे में बात करती थी। उन्होंने कहा कि मुझे गहरा अफसोस है कि वह अपनी प्रस्तुति और विचारों का आदान-प्रदान नहीं कर सकेंगी।

बी. पांडे द्वारा रचित एक लेख- बिश्वम्भरनाथ पाण्डे प्रसिद्ध इतिहासकार, गांधी दर्शन के मर्मज्ञ कवि, प्रखर स्वतंत्रता सेनानी, और साम्प्रदायिक सद्भावना के प्रबल समर्थक थे। उनका पहला ग्रंथ ‘विश्व का सांस्कृतिक इतिहास’ सात भागों में सन् 1952 में प्रकाशित हुआ।  हिन्दी, अंग्रेजी और उर्दू में लगभग 25 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। उनके सम्पादन में 4 जिल्दों में ‘स्पिरिट आफ इंडिया’ सन् 1975 में प्रकाशित हुई, जिसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। श्री पांडे उत्तर प्रदेश की विधान सभा और विधान परिषद् के भी विधायक रहे हैं। 1976 से 1982 तक राज्य सभा के मनोनीत सदस्य,

1982-83 में निर्वाचित सदस्य और 1988 में पुन: उन्हें राष्ट्रपति ने 6 वर्ष के लिए राज्य सभा का सदस्य मनोनीत किया। सन् 1983 से 1988 तक उड़ीसा के राज्यपाल के पद पर आसीन रहे। अपने लंबे कारावास जीवन में संसार के विविध धर्मों का गहरा अध्ययन किया है। सन् 1980 से गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के कार्यवाही अध्यक्ष और बाद में उपाध्यक्ष की हैसियत से सम्बद्ध रहे। सन् 1976 में उन्हें पदम्श्री की उपाधि से सम्मानित किया गया।

जिस तरह शिवाजी के संबंध में अंग्रेज़ इतिहासकारों ने ग़लतफ़हमियां पैदा की, उसी तरह औरंगज़ेब के संबंध में भी एक उर्दू शायर ने बड़े दर्द के साथ लिखा है-“तुम्हें ले  दे के, सारी दास्तां में, याद है इतना; कि आलमगीर हिन्दुकुश था, ज़ालिम था, सितमगर था!”बचपन में मैंने भी इसी तरह का इतिहास पढ़ा था और मेरे दिल में भी इसी तरह की बदगुमानी थी। लेकिन एक घटना ऐसी पेश आई, जिसने मरी राय बदल दी। मैं सन् 1948-53 में इलाहाबाद म्युनिसिपैलटी का चेयरमैन था। त्रिवेणी संगम के निकट सोमेश्वरनाथ महादेव का मंदिर है। उसके पुजारी की मृत्यु के बाद मंदिर और मंदिर की जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए। दोनों ने म्यूनिसिपैलटी में अपने नाम दाखिल ख़ारिज की दरख़ास्त दी। उनमें से एक फ़रीक़ ने कुछ दस्तावेज़ भी दाख़िल किए थे।

दूसरे फ़रीक़ के पास कोई दस्तावेज़ न था। जब मैंने दस्तावेजों पर नज़र डाली तो देखा कि वह औरंगज़ेब का फ़रमान था, जिसमें मंदिर के पुजारी को ठाकुर जी के भोग और पूजा के लिए जागीर में दो गांव अता किए गए थे। मुझे शुबहा हुआ कि यह दस्तावेज़ नकली है। औरंगज़ेब तो बुतशिकन, मूर्तिभंजक था।  वह बुतपरस्ती के साथ कैसे अपने को वाबस्ता कर सकता था। मैं अपना शक रफ़ा करने के लिए सीधा अपने चैंबर से उठकर सर तेज बहादुर सपू्र के यहां गया। सप्रू साहब फ़ारसी के आलिम थे। उन्होंने फ़रमान को पढ़कर कहा कि यह फ़रमान असली है।

मैंने कहा-‘डाक्टर साहब! आलमगीर तो मंदिर तोड़ता था। बुतशिकन था, वह ठाकुर जी को भोग और पूजा के लिए कैसे जायदाद दे सकता था?’ डा. सप्रू साहब ने अपने मुंशी को आवाज़ देकर कहा-‘मुंशी जी ज़रा बनारस के जंगमबाड़ी शिवमंदिर की अपील की मिसिल तो लाओ।’ डाक्टर सप्रू इलाहाबाद में इस मुकद्दमें के एक पक्ष के वकील थे। मुंशी जी मिसिल लेकर आये तो डाक्टर सप्रू ने दिखाया कि उसमें औरंगज़ेब के चार फ़रमान और थे जिनमें जंगमों को माफ़ी की ज़मीन अता की गई थी।

डाक्टर सप्रू हिन्दुस्तानी कल्चर सोसायटी के अध्यक्ष थे, जिसके पदाधिकारियों में डाक्टर भगवान, सैयद सुलेमान, सैयद सुलेमान नदवी, पंडित सुंदर लाल और डाक्टर ताराचन्द थे। मैं भी उसकी गवर्निंग बाडी का एक मैंबर था। डा. सपू्र की सलाह से मैंने भारत के प्रमुख मंदिरों की सूची प्राप्त की और उन सबके नाम पत्र लिखा कि अगर उनके मंदिरों को औरंगज़ेब या मुग़ल बादशाहों ने कोई जागीर दी हो, तो उनकी फोटो कापियां मेहरबानी करके भेजिये। दो तीन महीने की प्रतीक्षा के बाद हमें महाकाल मंदिर (उज्जैन), बालाजी मंदिर (चित्रकूट), उमानन्द मंदिर (गोहाटी), जैन मंदिर (गिरनार), दिलवाड़ा मंदिर (आबू), गुरुद्वारा रामराय (देहरादून) व$गैरह से सूचना मिली कि उनको औरंगज़ेब ने जागीरें अता की थीं। एक नया औरंगज़ेब हमारी आंखों के सामने उभर कर आया।

औरंगज़ेब ने इन मंदिरों को जागीरें अता करते हुए मंदिंर के पुजारियों से यह अपेक्षा की थी कि अपने ठाकुर जी से वह इस बात की प्रार्थना करें कि उसके खानदान में ताक़यामत हुकूमत बनी रहे। हमारी तरह हमारे आदरणीय मित्र और अन्वेषक श्री ज्ञानचन्द्र एवं प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डा. परमेश्वरीलाल गुप्त ने भी अपने शोध प्रबंधों  से हमारे इस कथन की पुष्टि की है। उनके अनुसार :

‘”हिन्दूद्रोही और मंदिर भंजक के रूप में जिस किसी इतिहासकार ने औरंगज़ेब का यह चित्र उपस्थित किया, उसने अंग्रेजों को अपनी फूट डालो और राज करो वाली नीति के प्रतिपादन के लिए एक जबरदस्त हथियार दे दिया। उसका भारतीय जनता पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा है कि उदार राष्ट्रीय विचारधारा के इतिहासकार और विशिष्ट चिंतक भी उससे अपने को मुक्त नहीं कर सके हैं। उन्होंने भी स्वयं तटस्थ भाव से तथ्यों का विश्लेषण न कर यह मान लिया है कि औरंगज़ेब हिन्दुओं के प्रति असहिष्णु था।’”

‘इसमें संदेह नहीं, औरंगज़ेब एक धर्मनिष्ठ मुसलमान था। उसने ऐसे अनेक कार्य किए, जिनसे उसकी इस्लाम के प्रति निष्ठा प्रकट होती है। उसने सत्तारूढ़ होते ही अपने सिक्कों पर उस कलमा के अंकन का निषेध किया, जिसे पूर्ववर्ती प्राय: सभी मुसलमान शासक इस्लाम धर्म का मूल मंत्र मानकर अपने सिक्कों पर अंकित करना अपना परम कत्र्तव्य मानते थे। औरंगज़ेब ने इस बात को सवर्था भिन्न दृष्टि से देखा। उसकी अपनी मान्यता थी कि सिक्के ऐसे लोगों के हाथों में भी जाएंगे, जो इस्लाम धर्म के अनुयायी नहीं हैं। इसी प्रकार उसके द्वारा जजि़या कर का जारी किया जाना भी उसकी इस्लामी सिद्धांतों के प्रति आस्था का प्रतीक है।

इस्लामी शरीयत के अनुसार, किसी इस्लामी शासक की सेना में यदि कोई ग़ैर मुसलमान व्यक्ति सैनिक न बनना चाहे तो सैनिक सेवा के बदले उससे एक हल्का सा कर लेने का विधान इस्लामी शास्त्रविदों ने किया है, उसे ही जजि़या कहते हैं। यह कर इस देश में मुसलमानों के शासन के आरंभ से ही प्रचलित था और इसके प्रति कभी किसी को किसी प्रकार का अनौचित्य नहीं दिखाई पड़ता था। अकबर ने अपनी उदार नीति के कारण इस कर को अपने समय में बंद कर दिया। औरंगज़ेब ने इतना ही किया कि उसे फिर से जारी कर दिया।

‘औरंगज़ेब के इन तथा इसी प्रकार के अन्य कार्यों को यदि तटस्थ भाव से देखा जाए तो उनमें ऐसी कोई बात नहीं मिलेगी जो उसकी अपनी धर्मनिष्ठा भावना के अतिरिक्त किसी अन्य बात का प्रतीक हो और हिन्दू अथवा किसी दूसरे धर्म के प्रति विद्वेष अथवा असहिष्णु भाव की अभिव्यक्ति हो। अत: हमारे इतिहासकारों की औरंगज़ेब के संबंध में क्या धारण रही है, इसको जानने और मानने की अपेक्षा अधिक उचित यह होगा कि हम औरंगज़ेब के समसामयिक बुद्धिवादियों के कथन को महत्व दें और देखें और जानें कि औरंगज़ेब के संबंध में उनकी क्या धारणा थी।’

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